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राखी का धागा सिर्फ कलाई पर नहीं, रिश्तों में भी बंधना चाहिए

Ravindra mishra

Aug 28, 2026 • 85 Views

राखी का धागा सिर्फ कलाई पर नहीं, रिश्तों में भी बंधना चाहिए

संपादकीय | वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र मिश्र

रक्षाबंधन बीत गया, लेकिन उसकी भावना अभी भी हमारे बीच मौजूद है। देशभर में भाई-बहन के इस पवित्र रिश्ते का पर्व पूरे उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया। कहीं बहनों ने भाइयों की कलाई पर राखी बांधी, कहीं भाइयों ने बहनों को उपहार देकर उनके सम्मान और सुरक्षा का संकल्प लिया तो कहीं दूर रहने वाले भाई-बहन तकनीक के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े। बाजारों से लेकर घरों तक त्योहार की रौनक दिखाई दी।

लेकिन सवाल यह है कि क्या रक्षाबंधन केवल राखी बांधने, मिठाई खिलाने और उपहार देने तक सीमित रह गया है? निश्चित रूप से नहीं। भारतीय परंपरा में त्योहार केवल उत्सव नहीं होते, वे जीवन के मूल्यों को याद करने और उन्हें व्यवहार में उतारने का अवसर भी होते हैं। रक्षाबंधन हमें प्रेम, विश्वास, त्याग और जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाता है।

समय बदल रहा है। संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवार ले रहे हैं। रोजी-रोटी की तलाश में बच्चे माता-पिता से और भाई-बहन एक-दूसरे से दूर रह रहे हैं। जीवन की आपाधापी में संवाद के लिए समय कम होता जा रहा है। ऐसे में रक्षाबंधन जैसे पर्व रिश्तों को फिर से जोड़ने का काम करते हैं।

हालांकि इस पर्व के संदेश को आज नए अर्थ में समझने की जरूरत है। बहन की रक्षा का मतलब यह नहीं कि उसे कमजोर मानकर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल भाई पर डाल दी जाए। वास्तविक रक्षा तब होगी, जब समाज बेटियों को समान अवसर देगा, उनकी शिक्षा सुनिश्चित करेगा, उनके निर्णयों का सम्मान करेगा और उन्हें आत्मनिर्भर बनने का पूरा अधिकार देगा।

इसी तरह भाई-बहन का रिश्ता केवल अधिकार का नहीं, बराबरी और सम्मान का रिश्ता होना चाहिए। बहन भी भाई की ताकत बन सकती है और भाई भी बहन से जीवन के संघर्षों में प्रेरणा ले सकता है। रिश्ते एकतरफा संरक्षण से नहीं, परस्पर सम्मान से मजबूत होते हैं।

आज जब समाज में व्यक्तिगत स्वार्थ बढ़ रहा है और मानवीय संवेदनाएं कई बार पीछे छूटती दिखाई देती हैं, तब रक्षाबंधन का संदेश और महत्वपूर्ण हो जाता है। हमें यह तय करना होगा कि राखी की डोर केवल अपनी बहन की कलाई तक सीमित न रहे, बल्कि समाज में सुरक्षा, सम्मान और विश्वास की भावना को भी मजबूत करे।

त्योहार की असली सफलता तभी है, जब उसका प्रभाव अगले दिन से हमारे व्यवहार में दिखाई दे। यदि एक भाई अपनी बहन के सम्मान के लिए खड़ा होता है, एक परिवार बेटी को बेटे के समान अवसर देता है और समाज महिलाओं के प्रति अपनी सोच बदलता है, तभी रक्षाबंधन का पर्व सार्थक माना जाएगा।

राखी का धागा बहुत पतला है, लेकिन इसके भीतर रिश्तों को जोड़ने की अपार शक्ति है। जरूरत केवल इतनी है कि हम इस धागे को रस्म नहीं, जिम्मेदारी समझें। कलाई पर बंधी राखी कुछ दिनों में पुरानी हो सकती है, लेकिन उससे जुड़ा प्रेम, विश्वास और सम्मान जीवनभर कायम रहना चाहिए।

यही रक्षाबंधन का संदेश है और यही इस पर्व की सबसे बड़ी सार्थकता भी।

— वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र मिश्र

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