एस. के. शुक्ला

वसई। महाराष्ट्र के वसई पश्चिम में स्वस्तिक सेवा संस्था की ओर से आयोजित दुर्गोत्सव में आस्था, वैदिक परंपरा और जनसेवा का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। संस्था पिछले नौ वर्षों से शारदीय नवरात्रि के अवसर पर मां भवानी की आराधना, हवनात्मक महायज्ञ और प्रतिदिन महाभंडारे का आयोजन करती आ रही है। इस वर्ष भी मां भवानी के दर्शन के लिए पालघर जिले के विभिन्न क्षेत्रों के साथ मुंबई और आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। आयोजन के दौरान प्रतिदिन लगभग 3,000 से 5,000 भक्त महाभंडारे का प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं।

वसई पश्चिम में गुरुद्वारे के समीप स्थापित मां भवानी की भव्य प्रतिमा श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है। मां के दिव्य स्वरूप और आकर्षक साज-सज्जा के दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ जुट रही है। श्रद्धालुओं के लिए यह आयोजन पूजा-अर्चना के साथ आध्यात्मिक अनुभूति और सेवा से जुड़ने का अवसर भी बन गया है।

**वैदिक अनुष्ठानों से होती है मां की आराधना**

नवरात्रि के दौरान कई स्थानों पर गरबा और डांडिया जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, लेकिन स्वस्तिक सेवा संस्था ने अपने दुर्गोत्सव में वैदिक अनुष्ठानों और आध्यात्मिक साधना को विशेष महत्व दिया है। यहां प्रतिदिन विधि-विधान से मां भवानी की पूजा-अर्चना के बाद हवनात्मक महायज्ञ किया जाता है। मंत्रोच्चार और आहुतियों के साथ होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के बाद आरती संपन्न होती है और श्रद्धालुओं के लिए महाभंडारे की व्यवस्था की जाती है।

मुख्य यज्ञाचार्य राधाकृष्ण जी महाराज तथा अन्य विद्वान पंडितों के मार्गदर्शन में प्रतिदिन पूजा-पाठ और हवनात्मक महायज्ञ संपन्न कराया जाता है। इसके साथ ही भजन संध्या, माता की चौकी और कीर्तन जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इन धार्मिक गतिविधियों से पूरे परिसर में भक्तिमय वातावरण बना रहता है।

**108 परिक्रमा में शामिल हो रहे श्रद्धालु**

दुर्गोत्सव में मां भवानी की 108 परिक्रमा विशेष आकर्षण का केंद्र है। श्रद्धालु अपनी आस्था व्यक्त करने और मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना के साथ इस धार्मिक परंपरा में भाग लेते हैं। कई भक्त मनोकामना पूरी होने के बाद भी मां के दरबार में पहुंचकर परिक्रमा करते हैं।

श्रद्धालुओं की मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धा के साथ मां भवानी की आराधना करने से मन को शक्ति और शांति मिलती है। परिक्रमा के दौरान भक्तों का उत्साह और समर्पण देखते ही बनता है। इसी कारण यह परंपरा आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।

**सुहागिन महिलाओं और 108 कन्याओं की आरती**

आयोजन में सुहागिन महिलाओं की विशेष आरती के साथ 108 कन्याओं की आरती भी की जाती है। भारतीय धार्मिक परंपरा में कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। इसी भावना के अनुरूप आयोजित आरती के दौरान मां भवानी के जयकारों और दीपों की रोशनी से पूरा परिसर भक्तिमय हो उठता है।

संस्था की ओर से धार्मिक परंपराओं का विधि-विधान से पालन किया जाता है। इसका उद्देश्य भारतीय संस्कृति, देवी उपासना और धार्मिक संस्कारों के महत्व को आगे बढ़ाना भी है।

**प्रतिदिन 3,000 से 5,000 श्रद्धालु ग्रहण कर रहे प्रसाद**

स्वस्तिक सेवा संस्था के दुर्गोत्सव की प्रमुख विशेषताओं में प्रतिदिन आयोजित होने वाला महाभंडारा शामिल है। संस्था से जुड़े भक्तों, दानदाताओं और सेवाभावी लोगों के सहयोग से रोजाना लगभग 3,000 से 5,000 श्रद्धालुओं के लिए भोजन और प्रसाद की व्यवस्था की जाती है।

नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए भोजन की व्यवस्था संस्था की सामूहिक सेवा भावना को दर्शाती है। महाभंडारा केवल प्रसाद वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि सेवा, समर्पण और समानता की भावना को भी मजबूत करता है।

संस्था से जुड़े लोगों का मानना है कि मां की आराधना के साथ श्रद्धालुओं और जरूरतमंदों की सेवा करना भी भक्ति का महत्वपूर्ण स्वरूप है। इसी सोच के तहत हवनात्मक महायज्ञ के बाद महाभंडारे का आयोजन किया जाता है, ताकि मां के दरबार में आने वाले श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण कर सकें।

**प्रवचनों में समझाया जाता है ‘नमस्तुते’ का अर्थ**

धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मुख्य यज्ञाचार्य राधाकृष्ण जी महाराज और अन्य पंडितों द्वारा श्रद्धालुओं को प्रवचनों के माध्यम से भक्ति का महत्व समझाया जाता है। प्रवचनों में मां की उपासना, मंत्रोच्चार और श्रद्धा के भाव पर प्रकाश डालते हुए देवी स्तुति में प्रयुक्त ‘नमस्तुते’ शब्द के आध्यात्मिक अर्थ को भी समझाया जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, ‘नमस्तुते’ का भाव देवी को नमन करने, उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने और श्रद्धापूर्वक उनकी वंदना करने से जुड़ा है। मां के समक्ष नतमस्तक होकर भक्त अपने विश्वास और समर्पण को व्यक्त करते हैं। प्रवचनों के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि भक्ति केवल शब्दों और कर्मकांड तक सीमित नहीं, बल्कि मन की पवित्रता और सेवा की भावना से भी जुड़ी है।

**‘स्वाहा’ और महाभंडारे की सेवा में समर्पण का संदेश**

स्वस्तिक सेवा संस्था के दुर्गोत्सव में हवनात्मक महायज्ञ और महाभंडारे को भक्ति के दो महत्वपूर्ण स्वरूपों के रूप में देखा जाता है। यज्ञ में ‘स्वाहा’ के साथ दी जाने वाली आहुति समर्पण का प्रतीक है, जबकि महाभंडारे के माध्यम से श्रद्धालुओं को भोजन और प्रसाद उपलब्ध कराना सेवा की भावना को दर्शाता है।

आयोजन में एक ओर वैदिक परंपरा के अनुसार हवनात्मक महायज्ञ होता है, तो दूसरी ओर हजारों श्रद्धालुओं के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती है। पूजा, यज्ञ, आरती, परिक्रमा और महाभंडारे के माध्यम से संस्था धार्मिक आस्था के साथ सामूहिक सहयोग और जनसेवा का संदेश दे रही है।

**व्यक्तिगत प्रचार के बजाय सेवा को प्राथमिकता**

स्वस्तिक सेवा संस्था के आयोजन की एक उल्लेखनीय विशेषता व्यक्तिगत प्रचार से दूर रहकर सेवा को महत्व देना है। संस्था के पंडाल में सहयोग करने वाले दानदाताओं के बैनर दिखाई देते हैं, लेकिन पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के नाम तथा तस्वीरों को प्रमुखता से प्रदर्शित नहीं किया जाता। संस्था के निमंत्रण पत्र में भी अध्यक्ष का नाम प्रमुखता से नहीं दिया जाता।

इस परंपरा के पीछे संस्था की सोच है कि सेवा किसी पद, नाम या व्यक्तिगत पहचान पर निर्भर नहीं होती। आर्थिक सहयोग देने से लेकर आयोजन की व्यवस्थाएं संभालने, धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने और महाभंडारे में श्रद्धालुओं की सेवा करने तक प्रत्येक योगदान को महत्वपूर्ण माना जाता है।

संस्था की कार्यशैली सामूहिक प्रयासों को प्राथमिकता देने पर आधारित है। इसके माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया जाता है कि धार्मिक आयोजनों की सार्थकता व्यक्तिगत पहचान से अधिक सेवा और समर्पण की भावना में निहित है।

**नौ वर्षों से जारी है दुर्गोत्सव की परंपरा**

स्वस्तिक सेवा संस्था पिछले नौ वर्षों से वसई पश्चिम में शारदीय नवरात्रि के अवसर पर दुर्गोत्सव का आयोजन करती आ रही है। मां भवानी की भव्य प्रतिमा, प्रतिदिन हवनात्मक महायज्ञ, भजन संध्या, माता की चौकी, कीर्तन, 108 परिक्रमा, सुहागिन महिलाओं की विशेष आरती, 108 कन्याओं की आरती और महाभंडारा इस आयोजन की प्रमुख विशेषताएं हैं।

पालघर जिले के विभिन्न क्षेत्रों के साथ मुंबई और आसपास से श्रद्धालुओं का पहुंचना आयोजन के प्रति लोगों की आस्था को दर्शाता है। भक्तों, दानदाताओं और सेवाभावी लोगों के सहयोग से संचालित यह आयोजन सामूहिक सहभागिता की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।

स्वस्तिक सेवा संस्था का दुर्गोत्सव यह संदेश देता है कि किसी धार्मिक आयोजन की पहचान केवल उसकी भव्यता या उसमें जुटने वाली भीड़ से नहीं होती। पूजा-अर्चना के साथ सेवा, समर्पण, सामूहिक सहयोग और श्रद्धालुओं को भोजन उपलब्ध कराने जैसे कार्य भी उसे विशिष्ट बनाते हैं। मां भवानी के दर्शन के लिए पहुंच रहे भक्तों के बीच संस्था का यह आयोजन आस्था और जनसेवा के समन्वय का उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।