इस्लाम में देशभक्ति: वतन से प्रेम के साथ नागरिक कर्तव्यों का संदेश
(सैयद जाहिद अली रियासत अली)
मुंबई। जिस मिट्टी में इंसान जन्म लेता है, जिसका पानी पीता है और जहां बचपन बिताता है, उससे प्रेम करना स्वाभाविक मानवीय भावना है। इस्लामी चिंतन में भी वतन से प्रेम को सकारात्मक भावना माना गया है। इसके साथ नागरिक कर्तव्यों, कानून के सम्मान और समाज के प्रति जिम्मेदारी को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
इस्लामी परंपरा में पैगंबर मुहम्मद के मक्का के प्रति प्रेम का उल्लेख मिलता है। हिजरत के समय मक्का से विदा होते हुए उनके द्वारा व्यक्त की गई भावनाओं को वतन के प्रति लगाव के उदाहरण के रूप में देखा जाता है। मदीना पहुंचने के बाद भी उन्होंने वहां के प्रति प्रेम और अपनत्व की दुआ की।
देशभक्ति के साथ नागरिक जिम्मेदारी जरूरी
इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार किसी देश का नागरिक होने के साथ उसके कानूनों और सामाजिक व्यवस्था का सम्मान करना भी जिम्मेदारी है। कुरआन में वचनों और समझौतों को पूरा करने पर जोर दिया गया है। इसी भावना के तहत ईमानदारी से करों का भुगतान, यातायात नियमों का पालन, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा और पर्यावरण को स्वच्छ रखना नागरिक कर्तव्यों का हिस्सा माना जा सकता है।
देश की न्याय व्यवस्था, पुलिस, सेना, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी संस्थाओं के प्रति सम्मान तथा कानून का पालन सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करता है। अराजकता और समाज में फसाद फैलाने से बचना भी इस दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सेवा और ईमानदारी भी देशभक्ति
देशभक्ति केवल तिरंगा फहराने या राष्ट्रगान गाने तक सीमित नहीं है। ईमानदारी से अपना काम करना, गरीबों और जरूरतमंदों की सहायता करना, शिक्षा को बढ़ावा देना और देश की प्रगति में योगदान देना भी देशसेवा का रूप है। विद्यार्थी, शिक्षक, व्यापारी, मजदूर और कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाकर राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकते हैं।
कट्टरता नहीं, जिम्मेदार नागरिकता
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